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Dr Alok Kumar
 विचार करें जब चीज़ें परिपक्व हों,

और फिर उनका आनंद लेते रहें. प्रकृति के सभी कार्य परिपक्वता के एक निश्चित बिंदु तक पहुँचते हैं; तब तक कि वे बेहतर बनें, उसके बाद उनका क्षय होने लगता है. कला के कुछ कार्य उस बिंदु तक पहुँच जाते हैं जहाँ सुधार की कोई संभावना नहीं रहती. यह अच्छे स्वाद का एक विशेष विशेषाधिकार है की वह उनकी परिपक्वता पर आनंद ले. सभी ऐसा नहीं कर पाते न ही सभी यह जान पाते हैं. यहां परिपक्व होने का एक बिंदु प्रज्ञा के फलों का भी है; यह उसके उपयोग की कीमत पर और आदान प्रदान की कीमत पर भी जनना ज़रूरी है.

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