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Dr Alok Kumar

ब्लॉग



अध्याय-2: स्थिर प्रज्ञ पुरुष : श्लोक 46-50
46. जिस प्रकार एक छोटे जलाशय के द्वार जितनी जरूरत की पूर्ति हो सकती है, उतनी पूर्ति एक बड़े जलाशय द्वारा स्वतः ही हो जाती है. उसी तरह से वेदों में वर्णित विभिन्न देवताओं की पूजा से जो फल प्राप्त ह[Read more]...

अध्याय-2: स्थिर प्रज्ञ पुरुष : श्लोक 41-45
41. हे अर्जुन! इस कर्मयोग में निश्चयात्मक (निश्चित) बुद्धि एकनिष्ठ होती है; किंतु अस्थिर विचार वाले विवेकहीन सकाम मनुष्यों की बुद्धियाँ निश्चित ही बहुत भेदों वाली (अनेक दिशा में बिखरी) और अनंत [Read more]...

अध्याय-2: स्थिर प्रज्ञ पुरुष : श्लोक 36-40
36. तुम्हारे शत्रु लोग तुम्हारे सामर्थ्य की निंदा करते हुए अनेक न कहने योग्य बातों को भी कहेंगे; उससे अधिक दुःख का विषय और क्या हो सकता है? 37. हे कुंती नंदन! या तो तुम युद्ध में मारे जाने पर स्वर्ग [Read more]...

अध्याय-2: स्थिर प्रज्ञ पुरुष : श्लोक 31- 35
31. इसके अतिरिक्त अपने धर्म को देखकर भी तुम्हारा विचलित होना उचित नहीं है, क्योंकि धर्म के लिए युद्ध करने की अपेक्षा क्षत्रिय के लिए इससे बढ़कर कोई दूसरा कल्याणकारी कर्तव्य नहीं है. 32. हे पार्थ![Read more]...

अध्याय-2: स्थिर प्रज्ञ पुरुष : श्लोक 26-30
26. हे महाबाहो! यदि तुम इस जीवात्मा को सदा जन्म लेने वाला तथा सदा मरने वाला मानते हो, तब भी तुम्हारा इस प्रकार से शोक करने का कोई कारण नहीं है. 27. क्योंकि इस मान्यता के अनुसार जन्म लेने वाले की मृत्[Read more]...

अध्याय-2: स्थिर प्रज्ञ पुरुष : श्लोक 21-25
21. हे पार्थ! जो पुरुष इस जीवात्मा को नित्य, अजन्मा, अपरिवर्तनशील और अविनाशी जानते हैं, वह पुरुष कैसे किसी की हत्या करवा सकते हैं या हत्या कर सकते हैं? 22. जिस तरह से मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्याग[Read more]...

अध्याय-2: स्थिर प्रज्ञ पुरुष : श्लोक16-20
16. अनित्य वस्तु (सर्दी-गर्मी आदि) तो स्थाई नहीं हैं और नित्य वस्तु (जीवात्मा) का विनाश नहीं होता है. इस प्रकार इन दोनों का ही सार तत्व ज्ञानी पुरुषों द्वारा देखा गया है. 17. किंतु जो इस सारे शरीर में[Read more]...

अध्याय-2: स्थिर प्रज्ञ पुरुष : श्लोक10-15
10. हे भरतवंशी धृतराष्ट्र! अंतर्यामी श्री कृष्ण ने दोनों सेनाओं के बीच में शोक करते हुए उस अर्जुन से हँसते हुए से यह वचन बोले- 11. हे अर्जुन! तुम न शोक करने योग्य मनुष्यों के लिए शोक कर रहे हो और पंड[Read more]...

अध्याय-2: स्थिर प्रज्ञ पुरुष : श्लोक 6-9
6. हम यह भी नहीं जानते कि हमारे लिए युद्ध करना और न करना, इन दोनों में से कौन-सा श्रेष्ठ है, अथवा यह भी नहीं जानते कि उन्हें हम जीतेंगे या हम को वे जीतेंगे. और जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही [Read more]...

अध्याय-2: स्थिर प्रज्ञ पुरुष : श्लोक 1-5
1-2. संजय बोले- उस प्रकार करुणा से व्याप्त और आँसुओं से भरी हुई और व्याकुल आँखों वाले वेदना से भरे हुए अर्जुन से मधुसूदन ने यह कहा - हे अर्जुन! तुम्हें इस असमय (गलत समय) में यह मोह क्यों हो रहा है? क्[Read more]...

अध्याय-1: श्लोक 40-46
40. हे कृष्ण! पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियाँ भी भ्रष्ट हो जाती हैं. हे वृष्णिवंशी! स्त्रियों के भ्रष्ट होने से वर्णसंकर पैदा होते हैं. 41. वर्णसंकर कुल के नाश करने वालों को और कुल को नरक मे[Read more]...

अध्याय-1: श्लोक 35-39
35. हे जनार्दन! तीनों लोकों के राज्य की प्राप्ति के लिए भी मैं इन्हें मारना नहीं चाहता हूँ: फिर पृथ्वी के राज्य लिए तो कहना ही क्या है? धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें क्या सुख प्राप्त हो सकत[Read more]...

अध्याय-1: श्लोक 27- 34
27-28. उन उपस्थित समस्त बंधुओं को देखकर कुंती के पुत्र अर्जुन ने अत्यधिक करुणा से युक्त होकर शोक करते हुए यह वचन बोले- “हे मेरे प्रिय श्री कृष्ण! युद्ध की इच्छा से इकट्ठे हुए अपने इन स्वजनों को देख[Read more]...

अध्याय-1: श्लोक 22-26
22-23. और जब तक कि मैं युद्ध क्षेत्र में खड़े हुए युद्ध के अभिलाषी इन सभी वीर योद्धाओं को भली प्रकार देख न लूँ कि इस युद्ध में मुझे किन-किन के साथ युद्ध करना होगा तथा दुर्बुद्धि धृतराष्ट्र के पुत्र[Read more]...

अध्याय-1: श्लोक 16-21
16. कुंती पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनंतविजय और नकुल और सहदेव ने सुघोष और मणिपुष्पक नामक शंख बजाए. 17-18. हे धृतराष्ट्र! श्रेष्ठ धनुषधारी काशीराज और महारथी शिखंडी तथा धृष्टधुम्न तथा राजा विराट, अजे[Read more]...

अध्याय-1: श्लोक 11-15
11. इसलिए सब मोर्चों पर अपनी-अपनी जगह स्थित रहते हुए आप सभी निःसंदेह भीष्म पितामह की ही सब प्रकार से रक्षा करें. 12. इसके बाद कौरवों में सबसे बड़े प्रतापी पितामह भीष्म ने दुर्योधन के हृदय में हर्ष[Read more]...

अध्याय-1: श्लोक 7-10
7. हे ब्राह्मणों में श्रेष्ठ! अपने पक्ष में भी जो सेनानायक हैं, उनके बारे में भी मैं उल्लेख कर रहा हूँ. आपकी जानकारी के लिए अपनी सेना के जो-जो सेनापति हैं, उनके नाम मैं बताता हूँ. 8. स्वयं आप, द्रोणा[Read more]...

अध्याय-1: श्लोक 1-6
1. धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्र हुए, मेरे और पांडु के पुत्रों ने युद्ध की इच्छा से एकत्र होने के बाद क्या किया. 2. संजय बोले- उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूह रचना में खड़[Read more]...

श्रीमद भगवत गीत का हिंदी अनुवाद
श्रीमद भगवत गीता हिन्दुओं के पवित्रतम ग्रन्थों में से एक है. महाभारत के युद्ध में श्रीमद भगवत गीता श्री कृष्ण और अर्जुन के बीच कुरुक्षेत्र के युद्ध के मैदान में युद्ध के प्रारंभ होने से पूर्[Read more]...